MS05 श्रीगीता-योग-प्रकाश ।। श्री गीता में फैले सैकड़ों भ्रामक विचारों में से गुप्त योग रहस्यों, योग विद्याओं की जानकारीयुक्त।

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योगः कर्मसु कौशलम् ' अर्थात् कर्म करने की कुशलता या चतुराई को योग कहते हैं । यहाँ ' योग ' शब्द उपर्युक्त अर्थों से भिन्न , एक तीसरे ही अर्थ में प्रयुक

Descriptions






भारत के एक बृहत् ग्रन्थ का नाम ' महाभारत ' है । कहा जाता है कि विश्व - साहित्य - भण्डार के पद्यबद्ध ग्रन्थों में यह सबसे विशेष स्थूलकाय है । यह केवल भारत ही नहीं , वरंच सम्पूर्ण विश्व में सुविख्यात है । यह ग्रन्थ अठारह भागों में विभक्त है । इसके प्रत्येक भाग को ' पर्व ' कहते हैं । इन अठारह पर्यों में से एक का नाम ' भीष्मपर्व ' है । इसी भीष्मपर्व के एक छोटे - से भाग का नाम ' श्रीमद्भगवद्गीता ' है । श्रीमद्भगवद्गीता का अर्थ ' भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गाया हुआ गीत ' है । इसलिए इसकी पद्यात्मक भाषा में तार ( टेलीग्राम ) द्वारा भेजे गए सन्देश की - सी संक्षिप्तता है । इसमें केवल ७०० श्लोक हैं तथा सब मिलकर ९ , ४५६ शब्द हैं । नौ हजार चार सौ छप्पन पद्यबद्ध शब्दों में उपनिषदों का सारांश आ गया है । इसीलिए इस पुस्तिका की बड़ी महत्ता है । यह तेजस्विनी पुस्तिका भारत की अध्यात्म - विद्या की सबसे बड़ी देन है । भारत आदिकाल से ही अध्यात्म - ज्ञान एवं योगविद्या का देश रहा है । इस विद्या के कोई गुरु कहीं बाहर से आकर यहाँ वालों को अध्यात्म - ज्ञान एवं योगविद्या की शिक्षा - दीक्षा दे गए हों , ऐसा एक भी उदाहरण भारत के हजारों साल लम्बे इतिहास में नहीं मिलता । उपर्युक्त विद्याओं के गुरु समय - समय पर इसी देश में उत्पन्न होते रहे हैं । पहले की बात तो जाने दीजिए , हजार साल की परतंत्रता से दीनापन्न भारत में भी इन विद्याओं के जानकार पूर्ववत् होते रहे हैं । भारत के स्वतंत्र होने के कुछ ही साल पूर्व श्रीपाल ब्रन्टन नाम के प्रतिष्ठित अँगरेज महाशय योग - विद्याओं के जानकारों की खोज में यहाँ आये और कुछ ही महीने ठहरकर वे जो कुछ जान पाये , उसी से सन्तुष्ट होकर अपने देश को लौट गये । इस देश को सर्वाधिक गौरव उपर्युक्त विद्याओं पर है और इन विद्याओं को श्रीमद्भगवद्गीता पर गौरव है ।



श्रीमद्भगवद्गीता का सत्य मूल सम्भवतः बहत्तर श्लोकी गीता ही हो ; किन्तु सप्त शत श्लोकी गीता ने भी विश्व की अनेक भाषाओं के साहित्यों में जो महत्त्वपूर्ण स्थान पाया है , उसकी समकक्षता की पंक्ति में एक भी साहित्य नहीं । गीताज्ञान के उद्गाता भगवान श्रीकृष्ण के ज्ञान में किसी भाँति की कमी थी , ऐसा कथन अति अश्रद्धेय है , किसी भाँति विश्वास - योग्य नहीं । इसलिए मानव - मात्र के कल्याण हेतु अत्यन्त और अनिवार्य आवश्यकता थी कि किसी पूर्ण समाधि - लब्ध महापुरुष की दिव्य वाणी के द्वारा भारत की राष्ट्रभाषा ' भारती ' में इसकी अनुभव - पूर्ण व्याख्या अभिलेखित हो । गीता - ज्ञान के बौद्धिक व्याख्याकारों - द्वारा यदि कहीं इसके शुभ्रतम प्रकाश में अज्ञान - तमस् का प्रवेश हुआ हो , तो अवश्य ही ' श्रीगीता - योग - प्रकाश ' की अनुभूत वाणी द्वारा उसका संहरण होगा ; इसी अविचल विश्वास के द्वारा यह प्रकाशन - कार्य अनुप्राणित है ।


' योग ' शब्द का अर्थ ' युक्त होना ' है । अर्जुन विषाद युक्त हुआ , इसी का वर्णन प्रथम अध्याय में है , इसीलिए उस अध्याय का नाम ' विषादयोग ' हुआ । जिस विषय का वर्णन करके श्रोता को उससे युक्त किया गया , उसको तत्संबंधी योग कहकर घोषित किया गया । अध्याय २ के श्लोक ४८ में कहा गया है - ' समत्वं योग उच्यते ' अर्थात् समता का ही नाम ' योग ' है । इससे स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ ' योग ' शब्द का अर्थ समता है । पुनः उसी अध्याय के श्लोक ५० में कहा गया है - ' योगः कर्मसु कौशलम् ' अर्थात् कर्म करने की कुशलता या चतुराई को योग कहते हैं । यहाँ ' योग ' शब्द उपर्युक्त अर्थों से भिन्न , एक तीसरे ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । अतएव गीता के तात्पर्य को अच्छी तरह समझने के लिए ' योग ' शब्द के भिन्न - भिन्न अर्थों को ध्यान में रखना चाहिए । गीता स्थितप्रज्ञता को सर्वोच्च योग्यता कहती है और उसकी प्राप्ति का मार्ग बतलाती है । स्थितप्रज्ञता , बिना समाधि के सम्भव नहीं है । इसीलिए गीता के सभी साधनों के लक्ष्य को समाधि कहना अयुक्त नहीं है । इन साधनों में समत्व - प्राप्ति को बहुत ही आवश्यक बतलाया गया है । समत्व - बुद्धि की तुलना में केवल कर्म बहुत तुच्छ है । ( गीता २ / ४ ९ ) इसलिए समतायुक्त होकर कर्म करने को कर्मयोग कहा गया है । यही ' योगः कर्मसु कौशलम् ' है । अर्थात् कर्म करने की कुशलता को योग कहते हैं । कर्म करने का कौशल यह है कि कर्म तो किया जाय ; परन्तु उसका बंधन न लगने पावे । यह समता पर निर्भर करता है । गीता न सांसारिक कर्तव्यों के करने से हटाती है और न कर्मबंधन में रखती है । समत्व - योग प्राप्त कर स्थितप्रज्ञ बन , कर्म करने की कुशलता या चतुराई में दृढ़ारूढ़ रह , कर्तव्य कर्मों के पालन करने का उपदेश गीता देती है ।


विशेष रूप से याद रखने की बात यह है कि गीता परम रहस्यमयी पुस्तिका है । इसकी गुप्त योग - रहस्य - निधियों पर भी प्रकाश डालने के लिए ' श्रीगीता - योग - प्रकाश ' लिखा गया है । उपर्युक्त दृष्टिकोणों से गीतार्थ के भाव आवश्यकतानुकूल लिखे गये हैं । ' श्रीगीता - योग - प्रकाश ' सब श्लोकों के अर्थ वा उनकी टीकाओं की पुस्तिका नहीं है । गीता के सही तात्पर्य को समझने के लिए जो दृष्टिकोण चाहिए , वही इसमें दरसाया गया है । गीता के बारे में फैले हुए सैकड़ों भ्रामक विचारों में से एक का भी निराकरण यदि ' श्रीगीता - योग - प्रकाश ' से हुआ , तो मैं अपना प्रयत्न सफल समझूगा ।


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