MS04 विनय-पत्रिका-सार सटीक ।। अनेक उपास्यों में पृथक्त्व केवल शरीरों में ही है, आत्मा में नहीं । इसे सिद्ध करनेवाली पुस्तक

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गुरु, अवतार, देवता-देवी आदि अनेक उपास्यों में पृथक्त्व केवल शरीरों में ही है, आत्मा में नहीं । इसकी साधना बिधि को खोलकर बतलाने वाली पुस्तक ।

Descriptions







विनय - पत्रिका ' गोसाईं तुलसीदासजी महाराज का अन्तिम ग्रंथ है । यह उनके निज विचारों और अनुभवों से भरा हुआ है । गोसाईंजी महाराज ने ' रामचरितमानस ' को ' सद्गुरु ज्ञान विराग जोग के ' कहकर उसे योग का सद्गुरु बतलाया है । यदि . ग्रंथकर्ता स्वयं योग का सद्गुरु न हो , तो उनका ग्रंथ योग का सद्गुरु कैसे हो सकता है ? गोस्वामीजी महाराज योग के सद्गुरु थे , इस बात को उनकी ' विनय - पत्रिका ' भली भाँति सिद्ध कर देती है । योग , वैराग्य , ज्ञान और भक्ति को प्रेम के अत्यन्त मधुर रस में पागकर बने हुए अत्युत्तम मोदक ' विनय - पत्रिका ' में भरे पड़े हैं , जो भव - रोगों से ग्रसित दुर्बल और आत्म - बलहीन जीवों के लिए अत्यन्त पुष्टिकर हैं । गोस्वामीजी महाराज प्राचीन काल के नारद , सनकादिक और परम भक्तिन शबरी की तरह के और आधुनिक काल के कबीर साहब और गुरु नानक इत्यादि संतों की तरह के भक्ति की चरम सीमा तक पहुँचे हुए , योग और ज्ञानयुक्त भक्ति में परिपूर्ण और निर्मल सन्त थे । ऐसे सन्त के अन्तिम ग्रन्थ में उनकी अन्तिम गति का भाव अवश्य ही वर्णित होगा । इसी भाव को जानने और उसे संसार के सामने प्रकाश करने के लिए यह ' विनय - पत्रिका - सार सटीक ' लिखने का मैंने प्रयास किया है । इससे गोस्वामीजी महाराज की अन्तिम गति का और उस गति तक पहुँचने के मार्ग का पता लग जाता है । इस मार्ग को जानकर यदि मनुष्य इसपर चले , तो अन्त में गोस्वामीजी महाराज की तरह परम कल्याण पा सके । मनुष्य के लिए इससे बढ़कर लाभ दूसरा नहीं हो सकता ।
कितने लोगों का यह विश्वास है कि प्राचीन काल के सनकादिक , देव - ऋषि नारद , कागभुशुण्डि और शवरी आदि की तरह सन्त , कलिधर्म के कारण इस युग में नहीं हो सकते । इसके उत्तर में गोस्वामीजी महाराज स्वयं ही कहते हैं कि ' काल धर्म नहिं व्यापहिं तेही । रघुपति चरन प्रीति अति जेही ।। ' ( रामचरितमानस , उत्तरकाण्ड ) और कुछ स्वल्प संख्यक लोग बहुत भद्दी - सी यह बात कहते हैं कि ' परम संत कबीर साहब और गुरु नानक साहब आदि सन्तों की तरह ऊँची गति गोस्वामीजी महाराज की नहीं थी । ' देश - कालातीत , अतिशय द्वैतहीन , त्रयवर्ग पर परमपद और सगुण शब्दब्रह्मैकपर ब्रह्मज्ञानी का वर्णन ' विनय - पत्रिका में गोस्वामीजी महाराज करते हैं , उससे आगे कोई विशेष पद है , जहाँ की गति कबीर साहब आदि संतों की थी और गोस्वामीजी महाराज की नहीं , युक्ति - संगत बात नहीं जंचती । अपने को विद्वान माननेवाले कुछ लोग ऐसे भी हैं , जो कबीर साहब ही को हेय दृष्टि से और गोस्वामीजी महाराज को ऊँची निगाह से देखते हैं । पर लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अपने ' गीता - रहस्य ' के अध्यात्म - प्रकरण में इस भाँति लिखकर कबीर साहब और गोस्वामीजी महाराज को सम गति के सिद्ध कर देते हैं ; यथा - ' उपर्युक्त विवेचन से विदित होगा कि सारे मोक्ष धर्म के मूलभूत अध्यात्मज्ञान की परम्परा हमारे यहाँ उपनिषदों से लगाकर ज्ञानेश्वर , तुकाराम , रामदास , कबीरदास , सूरदास , तुलसीदास इत्यादि आधुनिक साधु पुरुषों तक किस प्रकार अव्याहत चली आ रही है । ' गुरु , अवतार , देवता और देवी आदि अनेक उपास्यों में पृथक्त्व केवल शरीरों में ही है , आत्मा में नहीं । भक्ति के उत्तम साधन से आत्मा तक पहुँचने पर उपासकों की गतियों में अन्तर कहाँ रहा ? उपासना की इसी उत्तम विधि का पता इस " विनय - पत्रिका - सार सटीक ' में खोलकर बतलाया गया है । पाठकों से मेरा नम्र निवेदन है कि इसको सिलसिले के साथ ओर से छोर तक पढ़ें । इसको ठीक - ठीक समझने के लिए ' रामचरितमानस - सार सटीक ' के विचारों को भी जानने की बड़ी आवश्यकता है । (भूमिका से)

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